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    • AMRIT KAN

    AMRIT KAN [Books]

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    Quick Overview

    जब चित्त निर्मल हो जाता है जागे हुए आदमी का, तो चित्त की निर्मलता में परमात्मा की छवि दिखाई पड़नी षुरू हो जाती है। फिर वह निर्मल आदमी कहीं भी जाए--फूल में भी उसे परमात्मा दिखता है, पत्थर में भी, मनुष्यों में भी, पक्षियों में भी, पदार्थ में भी--उसके लिए जीवन परमात्मा हो जाता है। जीवन की क्रांति का अर्थ हैः जागरण की क्रांति

    Details

    जब चित्त निर्मल हो जाता है जागे हुए आदमी का, तो चित्त की निर्मलता में परमात्मा की छवि दिखाई पड़नी षुरू हो जाती है। फिर वह निर्मल आदमी कहीं भी जाए--फूल में भी उसे परमात्मा दिखता है, पत्थर में भी, मनुष्यों में भी, पक्षियों में भी, पदार्थ में भी--उसके लिए जीवन परमात्मा हो जाता है। जीवन की क्रांति का अर्थ हैः जागरण की क्रांति

    Additional Information

    Publisher Divyansh
    ISBN 978-93-84657-53-6
    Type Books

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